पद

33. हे सितावर हे राधावर रघुनंदन हे कुंवर कन्हाई

Hey sitavar hey radhavr raghunandan hey kunwar kanhai

अक्षर का आकार

हे सितावर हे राधावर रघुवर गिरधर छवि प्रगताई

हे सितावर हे राधावर रघुनन्दन हे कुंवर कान्हाई

हे सितावर हे राधावर रघुवर गिरधर छवि मन भाई
पतितन का सिरमौर रहा मैं कृपा हुई तुम्हरी प्रभुताई

मेरी करनी रही न कोई जासो रीझ मिलो सुखदाई
कितने जन्म हरी बिनु बीते याही जन्म हरी ना बिसराई
हे सितावर हे राधावर रघुवर गिरधर छवि संग आई
पतितन का सिरमौर रहा मैं कृपा हुई तुम्हरी प्रभुताई

त्रेता मैं सारंग को धारे द्वापर गिरिधर छवि प्रगताई
दोउ रूप सों कृपा करी तब मिश्रित छवि प्रगते जाई
हे सितावर हे राधावर रघुवर गिरधर छवि मन भाई
पतितन का सिरमौर रहा मैं कृपा हुई तुम्हरी प्रभुताई

कौतुक रघुनाथ रघु कुंज नाथ धनु गोपाल या छवि तिहारी
सेवाहित जब हुए ये तीनो कृपा भई तब हमपर भारी
हे सितावर हे राधावर रघुवर गिरधर छवि मन भाई
पतितन का सिरमौर रहा मैं कृपा हुई तुम्हरी प्रभुताई

शबरी जटायु अहिल्या उबारी कुब्ज़ा तुम द्वापर मैं तारी
अब तारों इस अधम पतित को अद्वैत राघव श्रीनाथ बिहारी
हे सितावर हे राधावर रघुवर गिरधर छवि मन भाई
पतितन का सिरमौर रहा मैं कृपा हुई तुम्हरी प्रभुताई

जानकीशरण ने आस लगाई स्वप्न हरी तब आप दिखाई
अद्वैत राघव श्रीनाथ बिहारी ह्रदय कुंज हरी प्रगते जाई
हे सितावर हे राधावर रघुवर गिरधर छवि मन भाई
पतितन का सिरमौर रहा मैं कृपा हुई तुम्हरी प्रभुताई

रचनाकार- जानकीशरण महाराज श्री

रचनाकार - जानकीशरण महाराज श्री