पद

32. हिय सों बाल रूप सोइ ध्याऊं

Hiye son baal roop soi dhyaaun

अक्षर का आकार

“हिये सों बाल रूप सोइ ध्याऊं
हिये सों बाल रूप सोइ ध्याऊं

नैन्न मैं बसों मुरलीधर जी
जित देखूँ उत पाऊं
हिये सों बाल रूप सोइ ध्याऊं

नाम तुम्हरा अधर पै आवे
अंतर मन हर्षाऊं
हिये सों बाल रूप सोइ ध्याऊं

वृन्दावन हिय प्रकट विराजो
नित्य मैं गिरधर ध्याऊं
हिये सों बाल रूप सोइ ध्याऊं

चरण कमल पर मृत्युंजय शिव
बलिहारी हो जाऊं
हिये सों बाल रूप सोइ ध्याऊं

लग्न लगी मोहे गिरधर प्रभु सों
गिरिराजधरण को पाऊं
जानकीशरण की आस यही है
रघुवर गिरधर गाउँ
हिये सों बाल रूप सोइ ध्याऊं

रचनाकार- मृत्युँजय (शिवशरण), जानकीशरणम् महाराज श्री

रचनाकार - जानकीशरण महाराज श्री