41. मेरो मन अनत कहाँ सुख पावे
Mero mn anat kahan sukh paave
अक्षर का आकार
मेरो मन अनत कहां सुख पावै।
जैसे उड़े जहाज को पंछी,
पुनि जहाज पै आवै॥
कमल-नैन को छांड़ि महातम,
और देव को ध्यावै।
परम गंग को छांड़ि पियासो,
दुर्मति कूप खनावै॥
जिहि मधुकर अंबुज-रस चाख्यो,
क्यों करील-फल भावै।
सूरदास प्रभु कामधेनु तजि,
छेरी कौन दुहावै॥
रचनाकार -सूरदास जी महाराज