संकीर्तन

35. सारंग धरण प्रभु तुम्हरी शरण

Sarang dharn prabhu tumhri sharan

अक्षर का आकार

सारंग धरण प्रभु तुम्हरी शरण

सारंग धरण प्रभु तुम्हरी शरण
राखो लाज हमारी रघुनन्दन

एक बाण सों तारका मारी
चरण छुआए अहिल्या तारी
हे राघव जू करलो वरण
सारंग धरण प्रभु तुम्हरी शरण

गौतम-नारी जड़ अवतारी,
प्रभु पद-पद्म की भई अधिकारी।
तार दिया भव-बाधा मरण,
सारंग धरण प्रभु तुम्हरी शरण।

गंगा तट पर केवट आया,
तुमने उसको पार लगाया।
मेट दिया भव-बाधा मरण,
सारंग धरण प्रभु तुम्हरी शरण।

जनक सभा में चाप चढ़ाया,
भूपन का अभिमान मिटाया।
सीता ने तब कीन्हा वरण,
सारंग धरण प्रभु तुम्हरी शरण।

बिछाई कुश की शैया सुंदर,
पहरे पर जागे निषादवर।
मित्र भाव का कीन्हा वरण,
सारंग धरण प्रभु तुम्हरी शरण।

शबरी के तुम आश्रम आए,
प्रेम सहित मीठे फल खाए।
करुणासिंधु हे कृपा करण ,
सारंग धरण प्रभु तुम्हरी शरण।

हे राघव प्राणो से प्यारे
ह्रदय विराजो आन हमारे
जानकीशारणं सिया शरण
सारंग धरण प्रभु तुम्हरी शरण।

सिया चरण सिया चरण दास पड़ो है सिया चरण
जानकीशरणम् जानकीशरणम् जानकीशरणम् सिया शरण

श्री नागधर
अद्वैत हरी
श्री कौतुक रघुनाथ
श्री रघु कुंज नाथ
श्री धनु गोपाल लाल कि जय

श्री अद्वैत राघव श्रीनाथाय नमः

रचनाकार- जानकीशरण महाराज श्री

रचनाकार - जानकीशरण महाराज श्री