31. सुनेरी मैंने निर्बल के बल राम
Suneri maine nirbal le bal raam
सुनेरी मैंने निर्बल के बल राम
नाथ तू अनाथ को
अनाथ कोन मोसों
मो सामान आरत नाहीं
आरत हर तोसों
सुनेरी मैने निर्बल के बल नाम
मुझे जन्म दिया है किसी कारण से तो भेजा है ठाकुरजी ने
मवता पिता को प्रणाम करके निकल गए
गाते हैं
सुनेरी मैंने निर्बल के बल राम
जब लग गज बल अपनो बरतो
नैक सरयओ नहीं काम
निर्बल है बलराम पुकारयो
ओ आये आधे नाम
जब गज 10 दिन तक रक्षा नाहीं कर पाया तब पुकारा है
ठाकुरजी ने हा वैकुंठ मैं कहा थ बोलते बोलते पहुँच गए उसके पास
नारायण खिलगुरो भगवान नमस्ते
गज नारायण पूरा बोल नाहीं पाया है ना बोलते ही आगए हें ठाकुरजी उसके पास
ड्रपद सुता निर्बल भई ता दिन
तज आये निज धाम
हे दुशाशन की भुजा थकित भई
तब बसन रूप भए श्याम
द्रौपदी उस समय मासिक धर्म मैं है लज्जा से व्याकुल है द्रौपदी ने जब अंतिम वस्त्र का टुकड़ा बचा है
जब अपने बलसे पतियों के बल से होनी रक्षा नाहीं कर पाई है
अब हाँथ छोड़कर भुजा उठाकर पुकारा है
हे कृष्ण द्वारिकावासिन क्वाशी क्वाशी महाभुजा
कौरवम प्रति भूतम वाले किम ना पश्यति केशवह
कहती हें हे नाथ कल को कोई कहेगा भरि सभा मैं कृष्ण की बहन निर्वास्त्र हुई तब विश्वास उठ जाएगा भक्तों का आपसे
ठाकुरजी एक क्षण मैं पहुँच गए
वस्त्र बनकर आगए हैं
आज यही सूरदास जी कह रहे मेरे माता पिता ने भले ही मुझे छोड़ दिया पर जैसे द्रौपदी के लिए आये मेरे लिए भी आएंगे
अप बल तप बल और बाहु बल
चौथो है बलराम
हे सूर किशोर कृपा से सब बल
हारे को हरि नाम
सुनेरी मैंने निर्बल के बल राम
रचनाकार - Soordaaj ji