पद

43. राघव प्यारी जनक दुलारी अति सुकमारी

Raghav pyaari Janakdulaari ati sukumaari

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राघव प्यारी जनक दुलारी अति सुकमारी
बांधून ये मन की डोर सिया जु से

1.मैं हूं अनाथ जगत मैं आया भया सनाथ रघुनाथ जो पाया
हरि गुन गावत राम रिझावत राम पुकारत राम मैं मेरी थोर सिया जु बांधून मैं मन की डोर

2.कुटिल स्वाभाव मैं हूं कामी निर्मल मन ना होय स्वामी
सियाजु को ध्यावत गुण मैं गावत शरण मैं आवत करो राम की ओर सिया जु बंधून मैं मन की डोर

3.जनक दुलारी करुणा खानि, मोरी अरज अब लेहु जानि।
हाथ पसारूँ, तुमको निहारूँ, जनम सुधारूँ, पकड़ो मेरी छोर,
सिया जु, बांधूँ मैं मन की डोर।

4.याही जगत में तुमको पुकारून तन मन धन सब तुम पर वारून
कैसे मैं पाऊं राम ही ध्याऊं राम को पाऊं ,राम से निस और भोर
सिया जु बांधून मैं मन मी डोर

5.राम ही केवल प्रेम पियारा जानन लेही सोइ जान निहारा
सिया सुकूमारी अवध बिहारी हे धनुधारी मैं पतितन सिरमौर
सिया जु बंधुन मैं मन की डोर

6.नाम तिहारो है सुखदाता, तुम ही पिता और तुम ही माता।
युगल सरूप, अनुपम रूप, भक्ति अनूप, नाचत मन को मोर,
सिया जु, बांधूँ मैं मन की डोर।

7.चरणन रज की आस लगाए, दरस दीवानी नयन बिछाए।
भव भय हारी, मंगल कारी, सब दुःख टारी, राखो अपनी कोर,
सिया जु, बांधूँ मैं मन की डोर।

8.चंद्र भाल गल मुंड की माला, राम नाम जपता मतवाला।
हे त्रिपुरारी, डमरू धारी, भव भय हारी, नाचत मन को मोर,
सिया जु, बांधूँ मैं मन की डोर।

9.पार्वती से शिव मुख बोले, राम नाम भव बंधन खोले।
सहस्र नाम सम, एक नाम दम, परम धाम सम, गूँजे चारों ओर,
सिया जु, बांधूँ मैं मन की डोर।

10.जनक दुलारी करुणा खानि, मोरी अरज अब लेहु जानि।
हाथ पसारूँ, तुमको ’पुकारूं जनम सुधारूँ, पकड़ो मेरी छोर,
सिया जु, बांधूँ मैं मन की डोर।

Rachnakaar - श्री जानकीशरण जी महाराज