45. राघव तुम ही प्राण अधार
Raghav tum hi praan adhaar
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राघव तुम ही प्राण अधार
करुणासिंधु दया को सागर
सुख को तुम भण्डार
राघव तुम ही प्राण अधार
सीतापति हे करुणा सिंधु
तुम ही जगत को सार
चरण शरण मैं हमको राखो
करो या भव से पार
राघव तुम ही प्राण अधार
मैं मूरख कुछ जानूँ नाही,
तुम ही पालनहार।
सौंप दिया है जीवन तुमको,
अब है तुम पर भार।
राघव तुम ही प्राण अधार...
वेद पुराण बखानत जिनके,
महिमा अपरम्पार।
सब ग्रंथों का सार तुम्ही हो,
हे करुणावतार।
राघव तुम ही प्राण अधार...
जानकीशरण चरण शरण में,
तज कर सब संसार।
तुम बिन मेरा कौन है राघव,
तुम ही खेवनहार।
राघव तुम ही प्राण अधार...
रचनाकार- जानकीशरण महाराज श्री