46. श्री राघव मैं जग माहीं फंसी
Shri raghav mein jag maahin fansi
Text size
श्री राघव मैं जग माहीं फंसी
बलिहारी वह बाल छवि पर
जो शिव चित्त बसी
श्री राघव मैं जग माहीं फंसी
राम नाम ही सत्य जगत मैं
कैसी कसा कसी
कैसी कसा कसी
माया हरी की प्रबल बड़ी है
बुद्धि जात घसी
श्री राघव मैं जग माहीं फंसी
या जग एक प्रपंच जाल है
कई जन्मों से फंसी
कई जन्मों से फंसी
ज्यूँ ना दरश तुम्हारा पाऊं
मानो नित काल दसी
श्री राघव मैं जग माहीं फंसी
भवसागर की लहरें भारी,
नैया मँझधार धँसी,
नैया मँझधार धँसी,
खेवनहार बनो मेरे प्रभु
विपदा जाये नसी,
श्री राघव मैं जग माहीं फंसी।
तुम बिन कौन हरे दुःख मेरो,
सूरत मन हुलसी,
सूरत मन हुलसी,
जानकीशरण को ऐसे राखो,
जैसे हरी-तुलसी,
श्री राघव मैं जग माहीं फंसी।
रचनाकार -जानकीशरण महाराज श्री