स्तोत्र राघव

34. श्री अद्वैत राघव श्रीनाथ अष्टकम

Shri Adwait Raghav Shrinath Ashtakam

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धनुर्बाण-पाणिं च वामे दधानं,
तथा सव्य-हस्तेन गोवर्धनं च।
मनोज्ञं कराभ्यां लसत्-कान्त-कायं,
राघव-श्रीनाथं भजेऽहम् भजेऽहम् ॥ १ ॥

महा-माया-केलिं जगन्नाथ-नाथं,
दया-सिन्धु-रूपं भव-पाश-मुक्तम्।
करे चाप-हस्तं गिरि-राज-हस्तं,
शिशुं बाल-लीला-विनोदं भजेऽहम् ॥ २ ॥

विशालं सुनात्रं शरच्चन्द्र-वक्त्रं,
मयूरादि-पिच्छं शिरो-रत्न-दीप्तम्।
कृपा-पूर्ण-दृष्टिं धरा-पालकम् तं,
राघव-श्रीनाथं भजेऽहम् भजेऽहम् ॥ ३ ॥

विचित्रां सुलीलां रचयन्त-मिष्टं,
विना वेणु-नादं धनु-चाप-हस्तम्।
शरण्यं प्रपालं नृणां दुःख-हारं,
नमामीश 'कौतुक-रघुनाथ' बालम् ॥ ४ ॥

अयोध्या-विहारं ब्रजे क्रीडमानं,
स्वरूपं ह्येकत्रं 'रघु-कुंज-नाथम्'।
शिखण्ड-प्रभं सायकं चाप-हस्तं,
राघव-श्रीनाथं भजेऽहम् भजेऽहम् ॥ ५ ॥

मया स्वप्न-मध्ये सदा दृष्ट-रूपं,
परं कौतुकानां निधानं विशालम्।
जगद्-बन्धु-पालं शरण्यं प्रपन्नं,
राघव-श्रीनाथं भजेऽहम् भजेऽहम् ॥ ६ ॥

न यस्य आदि-रन्तं न मध्यं कदापि,
विभुं विश्व-रूपं निराकार-रूपम्।
स्व-भक्त-प्रियार्थं धृतं बाल-रूपं,
राघव-श्रीनाथं भजेऽहम् भजेऽहम् ॥ ७ ॥

प्रपन्न-प्रपालं दया-वारि-राशिं,
नमस्ये नमस्ते नमस्ते पुनस्त्वाम्।
मम स्वान्त-वासे वसन्तं सदैव,
राघव-श्रीनाथं भजेऽहम् भजेऽहम् ॥ ८ ॥

रचनाकार - जानकीशरण महाराज श्री

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